नव नियतिवाद
टेलर महोदय ने 1920 के दशक में यह बताया कि ऑस्ट्रेलिया में कृषिय अधिवास की सीमा को वर्षा जैसे भौतिक पर्यावरण के तत्त्व प्रभावित करते हैं। निश्चयवाद तथा सम्भववाद की चरम सीमाओं के बीच सम्भावनावाद की अवधारणा को समझाने को टेलर ने ‘रुको और जाओ निश्चयवाद’ वाक्यांश का प्रयोग किया। इसके अनुसार टेलर ने मनुष्य पर प्रकृति के प्रभाव को स्वीकार किया परन्तु साथ ही यह तर्क भी दिया जाता है कि मनुष्य अपनी दक्षता, मानसिक क्षमता तथा विज्ञान व प्रौद्योगिकी के विकास के आधार पर अपनी आश्यकताओं के अनुसार प्रकृति का उपयोग भी कर सकता है। टेलर ने अपनी अवधारणा को निम्नलिखित शब्दों में व्यक्त किया।
इसके प्रतिपादक ग्रिफिन टेलर थे।
पुस्तक – आस्ट्रेलिमा
- यह विचारधारा, रूसी, अमेरिकन, तथा ब्रिट्रिश भुगोलवेताओं द्वारा प्रतिपादित की गई।
- इसके अनुसार प्रकृति पर मानव की पूर्ण विजभ नहीं मानव प्रकृति के साथ सामजस्य करता है।
- समर्थक कार्ल सावर, हरबर्टसन, रॉवस्की, फलूर, रूसी भुगोलवेता – डोकाचायेव, हंटिंग्टन। .
- न प्रकृति पर मनुष्भ का नियन्त्रण है- न मनुष्य ही प्रकृति का विजेता है. दोनो एक दुसरे से क्रियात्मक सम्बन्ध है मानव उन्नति के लिए आवश्यक है. मनुध्य प्रकृति का सहयोग प्राप्त करे –
ग्रिफिध टेलर ने पुस्तक –
- ज्योग्राफी इन दी दुवेण्टिमेथसेंचुरी (1951) में कहा है- कनाडा, टुण्डा, मरू. साइबेरिया, ऑस्ट्रेलिया मरुस्थल, अण्टार्कटिका में मानव को प्रकृति की आज्ञा माननी होगी, ये क्षेत्र कई शताब्दियों तक आर्थिक रूप से पिछड़े रहेंगे।
- ग्रिफिथ टेलर ने इसे “रूको और जाओ निभतिवाद” कहाँ- ग्रिफिथ टेलर ने अपनी पुस्तक” बीसवी शताब्दी” में भुगोल इस तथ्य पर बल दिया, कि पर्यावरणीभ नियन्त्रण की उपेक्षा नहीं की जा सकती, लेकिन इसके द्वारा निर्धारित सीमाओं में भी नहीं बंधा जा सकता, अर्थात न तो प्रकृति का विजेता है- और न ही मनुष्य पर पुर्ण निमन्त्रण है- दोनो एक-दूसरे से क्रियात्मक संबंध है-
- जी. टेथम ने नव निश्चयवाद को व्यवहारिक संभववाद की सज्ञा दी।